– हीरों के जौहरी ने रच दिया इतिहास, सारी संपत्ति नारी शक्ति के नाम कर खुद हो गए पीछे
– नारी को नेतृत्व सौंपने के लिए बेच दी पूरी जमीन-जायदाद, ट्रस्ट बनाकर माताओं-बहनों को सौंपी संगठन की कमान
1937 में बोया नारी सशक्तिकरण का बीज आज 140 देशों में बन चुका है आध्यात्मिक वटवृक्ष
18 जनवरी 1969 को 93 वर्ष की आयु में अव्यक्त हुए थे ब्रह्मा बाबा, आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है उनका जीवन
आबू रोड/राजस्थान। जिस दौर में महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित रखने की सोच समाज में गहरी थी, उस दौर में एक व्यक्ति ने नारी की शक्ति और सामर्थ्य पर ऐसा विश्वास जताया कि अपनी करोड़ों की संपत्ति माताओं-बहनों के नाम कर दी। केवल संपत्ति ही नहीं, बल्कि पूरे संगठन के संचालन की जिम्मेदारी भी महिलाओं को सौंप दी और स्वयं पर्दे के पीछे रहकर सेवा का मार्ग चुना। न परिवारवाद की चिंता, न पद-प्रतिष्ठा की लालसा और न ही सत्ता की आकांक्षा। हीरे-जवाहरात के कारोबार से अपार संपत्ति अर्जित करने वाले इस शख्स ने जीवन के 60वें पड़ाव पर ऐसा आध्यात्मिक मोड़ लिया कि कारोबार समेटकर मानवता के उत्थान और विश्व परिवर्तन के मिशन में जुट गए।
यह कहानी है प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के संस्थापक दादा लेखराज कृपलानी की, जिन्हें दुनिया प्यार से ब्रह्मा बाबा के नाम से जानती है। 18 जनवरी 1969 को 93 वर्ष की आयु में वे अव्यक्त हो गए, लेकिन नारी को नेतृत्व की शक्ति बनाने और आध्यात्मिक जागृति से विश्व परिवर्तन का जो संकल्प उन्होंने लिया था, वह आज भी आगे बढ़ रहा है। वर्ष 1937 में एक छोटे से आध्यात्मिक संगठन के रूप में शुरू हुई यह यात्रा आज 140 देशों तक पहुंच चुकी है। स्व परिवर्तन से विश्व परिवर्तन और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का संदेश देने वाला यह संगठन नारी नेतृत्व की ऐसी मिसाल है, जहां हजारों महिलाएं आध्यात्मिक और सामाजिक सेवाओं की कमान संभाल रही हैं।
हीरों के जौहरी से विश्व शांति के मसीहा तक का सफर-
15 दिसंबर 1876 को जन्मे दादा लेखराज बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि, ईमानदार और धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उन्होंने हीरे-जवाहरात के कारोबार में अपनी अलग पहचान बनाई और प्रतिष्ठित व्यापारी के रूप में प्रसिद्धि हासिल की। आर्थिक संपन्नता के बावजूद उनके मन में परमात्मा की खोज और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को जानने की गहरी जिज्ञासा थी। इसी लगन में उन्होंने जीवनकाल में कई गुरुओं का मार्गदर्शन प्राप्त किया। कहा जाता है कि वे गुरु के बुलावे को जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश मानते थे।
आध्यात्मिक अनुभूतियों ने बदली जीवन की दिशा-
जीवन के करीब 60वें वर्ष में वर्ष 1936 के दौरान उन्हें ऐसी गहन आध्यात्मिक अनुभूतियां हुईं, जिन्होंने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। ध्यान और आध्यात्मिक अनुभवों के माध्यम से उन्हें सृष्टि परिवर्तन तथा नई दुनिया की स्थापना का संदेश मिला। इसके बाद सांसारिक कारोबार और संपत्ति के प्रति उनका मोह समाप्त होता चला गया। उन्होंने हीरे-जवाहरात का कारोबार समेटने और अपना संपूर्ण जीवन ईश्वरीय सेवा के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया। वर्ष 1937 में इसी संकल्प को संस्थागत स्वरूप देते हुए माताओं-बहनों के नाम ट्रस्ट बनाया और आध्यात्मिक शिक्षा एवं राजयोग के माध्यम से मानव जीवन में परिवर्तन का कार्य शुरू किया।
नारी पर जताया ऐसा विश्वास कि सौंप दी पूरे संगठन की कमान
ब्रह्मा बाबा के जीवन का सबसे क्रांतिकारी निर्णय महिलाओं को संगठन की सर्वोच्च जिम्मेदारी सौंपना था। उस समय समाज में महिलाओं को नेतृत्व देने की कल्पना भी बहुत सीमित थी, लेकिन उन्होंने नारी को केवल सम्मान की पात्र नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन की प्रमुख शक्ति माना। उन्होंने अपनी संपत्ति माताओं-बहनों के नाम ट्रस्ट को समर्पित कर दी और संगठन के संचालन की जिम्मेदारी भी उन्हीं को सौंप दी। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को संगठन के संचालन में विशेष प्राथमिकता नहीं दी। उनकी एक बेटी और दो बेटे थे, लेकिन उन्होंने बेटी को भी संचालन समिति में शामिल नहीं किया, ताकि संस्था में परिवारवाद की भावना पैदा न हो। उनका मानना था कि आध्यात्मिक संगठन का संचालन योग्यता, त्याग, तपस्या और सेवा भावना के आधार पर होना चाहिए, न कि पारिवारिक संबंधों के आधार पर।
पैसों को हाथ तक नहीं लगाया, खुद को रखा सबसे पीछे
संपन्न व्यापारी से आध्यात्मिक जीवन अपनाने के बाद ब्रह्मा बाबा ने स्वयं को पूरी तरह सादगी और त्याग के जीवन में ढाल लिया। संगठन की आर्थिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियां माताओं-बहनों को सौंपने के बाद उन्होंने व्यक्तिगत रूप से धन के लेन-देन से भी दूरी बना ली। यहां तक कि स्वयं के लिए भी आवश्यकता पड़ने पर बहनों से पैसे मांगते थे। उनके जीवन में निर्माण भाव, विनम्रता और समर्पण की भावना इतनी गहरी थी कि उन्होंने कभी पद या प्रतिष्ठा को महत्व नहीं दिया। बाबा का विश्वास था कि नारी शक्ति ही आने वाले समय में विश्व परिवर्तन और मानवता के कल्याण में अग्रणी भूमिका निभाएगी। उनका यही संकल्प आगे चलकर ब्रह्माकुमारीज संस्थान की पहचान बन गया।
नारी नेतृत्व का दुनिया में अनूठा उदाहरण बना संगठन
ब्रह्माकुमारीज संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता इसका महिला नेतृत्व है। यहां मुख्य प्रशासिका से लेकर सेवाकेंद्रों के संचालन और विभिन्न विभागों की जिम्मेदारियों तक महिलाओं की प्रमुख भूमिका है। संगठन की व्यवस्था में बहनें नेतृत्व करती हैं और भाई उनके सहयोगी के रूप में सेवाएं देते हैं। भोजनालय से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक सामूहिक सेवा और महिला नेतृत्व की झलक दिखाई देती है। नारी सशक्तिकरण की इस अनूठी व्यवस्था की सराहना राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु भी कर चुकी हैं। एक कार्यक्रम में उन्होंने संगठन की कार्यशैली और महिलाओं की भूमिका को देखते हुए कहा था कि महिलाओं को अवसर और जिम्मेदारी मिले तो वे अपनी क्षमता से बड़े कार्य कर सकती हैं। ब्रह्माकुमारीज की स्थापना के समय लिया गया नारी नेतृत्व का संकल्प आज हजारों महिलाओं के जीवन में आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और नेतृत्व की प्रेरणा बन रहा है।
चौथी पास से पीएचडी तक पढ़ी बहनें निभा रहीं आध्यात्मिक जिम्मेदारी
ब्रह्माकुमारीज संस्थान में सेवा और नेतृत्व के लिए केवल औपचारिक शिक्षा को आधार नहीं माना जाता। इसका उदाहरण संस्थान की पूर्व मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी दादी जानकी का जीवन है। दादी जानकी ने मात्र चौथी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की थी, लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान, राजयोग और आत्मविश्वास के बल पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। 60 वर्ष की आयु में विदेश यात्रा शुरू करने के बाद उन्होंने 100 से अधिक देशों में भारतीय अध्यात्म और राजयोग मेडिटेशन का संदेश पहुंचाया। संस्थान में ऐसी अनेक बहनें हैं, जिन्होंने सीमित औपचारिक शिक्षा के बावजूद आध्यात्मिक ज्ञान और प्रभावशाली वक्तृत्व कला से समाज में अपनी अलग पहचान बनाई है। वहीं दूसरी ओर डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, वकील, प्रोफेसर, न्यायाधीश, आईएएस अधिकारी और संगीत जगत से जुड़ी महिलाएं भी अपनी व्यावसायिक शिक्षा पूरी करने के बाद आध्यात्मिक जीवन अपनाकर समर्पित सेवाएं दे रही हैं। यहां व्यक्ति की पहचान उसकी डिग्री से अधिक उसके संस्कार, अनुशासन, आत्मबल और सेवा भावना से होती है।
140 देशों में पांच हजार से अधिक सेवाकेंद्र, 46 हजार समर्पित बहनें
1937 में शुरू हुई यह आध्यात्मिक यात्रा आज विश्वव्यापी स्वरूप ले चुकी है। संस्थान के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में 140 देशों में पांच हजार से अधिक सेवाकेंद्र संचालित हैं। करीब 46 हजार ब्रह्माकुमारी बहनें समर्पित रूप से अपनी सेवाएं दे रही हैं। 20 लाख से अधिक लोग नियमित विद्यार्थी के रूप में संस्थान से जुड़े हैं, जो सेवाकेंद्रों पर मुरली क्लास और आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करते हैं। वहीं करीब दो लाख युवा बालब्रह्मचारी जीवन अपनाकर संस्थान की सेवाओं में योगदान दे रहे हैं। समाज के सभी वर्गों तक आध्यात्मिक शिक्षा पहुंचाने के लिए राजयोग एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन के अंतर्गत 20 प्रभाग बनाए गए हैं। इनके माध्यम से शिक्षा, चिकित्सा, प्रशासन, राजनीति, उद्योग, व्यापार, महिला, युवा, किसान और सामाजिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों के बीच विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
राजयोग मेडिटेशन है मुख्य शिक्षा
ब्रह्माकुमारीज संस्थान की मुख्य शिक्षा भारतीय पुरातन आध्यात्मिक संस्कृति और राजयोग मेडिटेशन पर आधारित है। संस्थान में नए विद्यार्थियों को सबसे पहले सात दिन का नि:शुल्क राजयोग मेडिटेशन कोर्स कराया जाता है। इसमें आत्मा और परमात्मा का परिचय, सृष्टि चक्र का रहस्य, कर्मों की गहन गति, आत्मा के 84 जन्मों की मान्यता, कल्पवृक्ष का आध्यात्मिक महत्व और जीवन में पवित्रता की भूमिका समझाई जाती है। इसके साथ ही विचारों पर नियंत्रण, सकारात्मक चिंतन, तनावमुक्त जीवन और नैतिक मूल्यों को व्यवहार में अपनाने की शिक्षा दी जाती है। सात दिन का कोर्स पूरा करने के बाद विद्यार्थी नियमित मुरली क्लास और सत्संग में भाग लेते हैं। संस्थान की मान्यता है कि व्यक्ति जब अपने विचारों, संस्कारों और व्यवहार में बदलाव लाता है, तभी परिवार, समाज और विश्व में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
स्व परिवर्तन से विश्व परिवर्तन है संस्थान का ध्येय
ब्रह्मा बाबा का मानना था कि दुनिया को बदलने की शुरुआत स्वयं से करनी होगी। इसी विचार को संस्थान ने स्व परिवर्तन से विश्व परिवर्तन के ध्येय वाक्य के रूप में अपनाया है। राजयोग मेडिटेशन के माध्यम से व्यक्ति को अपने मन, विचारों और संस्कारों को श्रेष्ठ बनाने का अभ्यास कराया जाता है। ज्ञान, योग, सेवा और धारणा को आध्यात्मिक जीवन के चार प्रमुख आधार माना गया है। संस्थान की बहनें केवल आध्यात्मिक ज्ञान और ध्यान का अभ्यास ही नहीं करातीं, बल्कि समाज में नशामुक्ति, महिला सशक्तिकरण, युवा जागृति, पर्यावरण संरक्षण, यौगिक खेती और पौधारोपण जैसे अभियानों के माध्यम से भी सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करती हैं।
माउंट आबू में है अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय
वर्ष 1950 में संस्थान का मुख्यालय माउंट आबू, राजस्थान स्थानांतरित किया गया। उस समय संगठन का नाम ओम मंडली से बदलकर प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय रखा गया। मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती को संस्थान की प्रथम मुख्य प्रशासिका नियुक्त किया गया। उनके बाद दादी प्रकाशमणि, दादी जानकी और दादी हृदयमोहिनी ने संगठन की कमान संभाली। इसके बाद राजयोगिनी दादी रतनमोहिनी ने संस्थान की पांचवीं मुख्य प्रशासिका के रूप में कमान संभाली। वर्तमान में राजयोगिनी मोहिनी दीदी मुख्य प्रशासिका के रूप में संचालन कर रही हैं। आज आबू रोड स्थित शांतिवन सहित माउंट आबू के विभिन्न परिसरों से संस्थान की अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों का संचालन होता है। देश-विदेश से हजारों लोग यहां राजयोग मेडिटेशन, आध्यात्मिक सम्मेलन और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेने पहुंचते हैं।
18 जनवरी को ब्रह्मा बाबा की पुण्यतिथि केवल एक संस्थापक को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि उनके उस महान संकल्प को याद करने का दिन है, जिसमें उन्होंने स्वयं पीछे रहकर नारी को आगे बढ़ाया। हीरों के कारोबार से विश्व शांति और मानवता की सेवा तक का उनका सफर इस बात की प्रेरणा देता है कि सच्चा नेतृत्व पद और प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि दूसरों को आगे बढ़ाने के त्याग और सामर्थ्य में छिपा होता है। जिस नारी शक्ति को नेतृत्व सौंपने का बीज उन्होंने 1937 में बोया था, वह आज विश्वभर में आध्यात्मिक जागृति और आत्मपरिवर्तन का संदेश दे रहा है।