नई राहें….जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण
बीके पुष्पेंद्र, पत्रकार एवं मोटिवेशनल लेखक
सागर। नारी ईश्वर की वह अनुपम कृति, उपहार, वरदान है जिसके व्यक्तित्व और कृतित्व में सारा संसार समाया है। मां के रूप में सृजनहार बनकर जीवन को गढ़ती है तो ममता की छांव में पालनहार बनकर इसे संवारती है। नारी की गाथा, महिमा, अनंत, अद्भुत और अवर्णनीय है। क्योंकि इस धरा पर नारी ही ईश्वर की वह रचना है जिसमें उसके स्वरूप दिखता है। हमारी पुरातन देवी-देवता संस्कृति, सनातन संस्कृति की महानता और विशालता ही है कि देवताओं के पहले देवियों का नाम लिया जाता है- श्रीलक्ष्मी- श्रीनारायण, श्रीराधे-श्रीकृष्ण, श्रीसीता-श्रीराम। हमारी संस्कृति में नौ देवियां, नौ गुणों, शक्तियों, विशेषताओं और वरदानों की मूर्ति हैं। कहीं भी नौ देवताओं का वर्णन नहीं है। हमारे देश की महानता का इससे बढ़कर कोई उदाहरण नहीं हो सकता है, जहां भारत को माता कहा जाता है। यह हमारी संस्कृति और सभ्यता की ही महानता है कि हमारे देश में नदियों को भी मां गंगा, मां नर्मदा, मां जमुना, मां कावेरी, मां सरस्वती, मां गोदावरी कहा जाता है। नारी के मां रूप की महिमा अपरंपार, अपार और अनंत है। इसे शब्दों में न बांधा जा सकता है और न बयां किया जा सकता है। सनातन संस्कृति में भगवान, ईश्वर को माता और पिता दोनों कहा गया है, उनका मातृ रूप भी है तो पितृ रूप भी है। हम भगवान की महिमा में गाते हैं कि तुम्हीं मात-पिता, बंधु, सखा, गुरु सब एक तुम्हीं हो प्रभु। परमात्मा ब्रह्मा तन का आधार लेकर नई दुनिया की उत्पत्ति, रचना करते हैं तो यहां नई दुनिया का रचनाकार, सृजनहार होने से वह ब्रह्मा मां रूप में हैं तो विष्णु के द्वारा पालन करते हैं तो पितृ रूप में परिवार की तरह संभालते हैं। मातृ रूप के बिना यह संसार अधूरा और अपूर्ण है। सृष्टि की रचना में मां का रूप ही इसे पूर्णता प्रदान करता है।
शास्त्रों में नारी को बताया है यज्ञ समान पूजनीय-
मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में नारी की महिमा में लिखा है कि- यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता। अर्थात् जिस कुल में, घर में स्त्रियों का आदर है, वहां देवता प्रसन्न रहते हैं, देवताओं का वास होता है। अथर्ववेद (7.47.1) में लिखा है कि हे स्त्री! तुम सभी कर्मों को जानती हो। हे स्त्री! तुम हमें ऐश्वर्य और समृद्धि दो। वहीं (7.47.2)श्लोक में लिखा है कि- तुम सबकुछ जानने वाली हमें धन–धान्य से समर्थ कर दो। हे स्त्री! तुम हमारे धन और समृद्धि को बढ़ाओ। (11.1.17) श्लोक में लिखा है कि स्त्रियां शुद्ध स्वभाव वाली, पवित्र आचरण वाली, यज्ञ समान पूजनीय, सेवा योग्य, शुभ चरित्र वाली और विद्वत्तापूर्ण हैं।
नारी के शक्ति और साहस से भरा है इतिहास-
इतिहास गवाह है कि जब-जब राज्यसत्ता, धर्मसत्ता पर आक्रांताओं ने प्रहार किया है तो नारी ने अपने साहस, शौर्य, वीरता और शक्ति से खुद को साबित किया है। फिर रुद्रमा देवी हों जिन्होंने अपनी वीरता का लोहा मनवाया या रानी दुर्गावती जिन्होंने आक्रांतोओं को मुंहतोड़ जवाब दिया। इंदौर के होलकर राजघराने की देवी अहिल्याबाई ने न केवल काशी विश्वनाथ, सोमनाथ, महाकाल और अन्य शिव मंदिरों का पुनःनिर्माण कराया, बल्कि अंग्रेजों के समय सिर्फ होल्कर राजाओं ने अधीनता स्वीकार नहीं की तो इसका सारा श्रेय मां अहिल्याबाई को जाता है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता से सभी परिचित ही हैं। मैसूर के कित्तूर राज्य की रानी चेन्नम्मा ने अंग्रेजों की राज्य हड़प नीति के विरोध में सशक्त विद्रोह किया तो बेगम हज़रत महल ने अंग्रेजों को धूल चटा दी थी। भक्त मां मीराबाई के अगाध प्रेम के आगे भगवान भी नतमस्तक हो गए तो रानी कर्णावती, रजिया सुल्तान, कस्तूरबा गांधी, कमला नेहरू, काली बाई, सावित्री बाई फुले, विजयलक्ष्मी पंडित, मदर टेरेसा ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से समाज को नई राह दिखाई है। न जाने ऐसी कितनी वीरांगनाएं और समाज सुधारक नारियों ने जन्म लिया है जिनकी गौरवगाथा सुनकर आज भी हम गर्वित होते हैं।
विश्व परिवर्तन का कलश भी नारी के सिर-
परमात्मा तो जानी-जाननहार है। वह अच्छे से जानता है कि शिव शक्ति, नारी शक्ति के बल से ही विश्व शांति, विश्व परिवर्तन और नवयुग का निर्माण संभव है। नारी में छिपे अनंत दिव्य गुण, विशेषताओं को देखते हुए उनके सिर पर विश्व परिवर्तन का कलश रखा। क्योंकि सृजन के कार्य में समुद्र की तरह विशालता, शांति और धैर्य तो आसमान की तरह ऊंची सोच, प्रकृति की तरह सदा देने वाले दाताभाव की तो मां की तरह स्नेह-प्यार की जरूरत होती है। मां सरस्वती की तरह ज्ञानवीणा की तो मां दुर्गा की तरह आसुरी प्रवृत्ति, बुराइयों, आसुरी कर्म, सोच पर पूरी शक्ति के साथ प्रहार की। यह सब एक नारी के बलबूते ही संभव है।
आज से 87 वर्ष पूर्ण भारत माता और वंदे मातरम् की गाथा को चरितार्थ करते हुए वर्ष 1937 में परमात्मा का इस धरा पर दिव्य और अलौकिक अवतरण हुआ। प्रजापिता ब्रह्मा बाबा के तन का आधार लेकर उन्होंने ज्ञान बल, योग बल की शक्ति से नारी की सोई हुईं शक्तियों का एहसास कराया। उनमें बल भरा और दिव्य ज्ञान दिया कि- तुम ही शिव शक्ति हो, तुम ही मां दुर्गा, मां काली, मां संतोषी, मां सरस्वती हो। अब अपनी शक्ति को पहचानो, खुद को ज्ञान-योग की शक्ति से भरपूर कर ज्ञान गंगा, उद्धारिणी, कल्याणी बनकर इस जग का उद्धार करने में खुद को समर्पित कर दो। हे! शिव शक्ति अब अज्ञान निद्रा को त्यागो और त्याग, तप, संयम, साधना के मार्ग पर चलकर अपनी गाथा को चरितार्थ करो। सारा विश्व तुम्हें आशा की नजरों से देख रहा है। तुम्हें ही समाज में आशा और उम्मीद जगाना है। जन-जन को सच्चा गीता ज्ञान देकर उन्हें जन्मोंजन्म के लिए सुख-शांति, पवित्रता, आनंद का मार्ग दिखाना है। राजयोग की शिक्षा से तुम्हें इस जग पर फिर से स्वर्ग सजाना है। पूरी दुनिया में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय ही नारी शक्ति का एकमात्र सबसे बड़ा संगठन है जहां सेवाकेंद्र से लेकर मुख्य प्रशासिका का दायित्व महिलाएं संभालती हैं। भाई सहयोगी के रूप में साथ देते हैं। दुनिया में इससे बड़ा महिला सशक्तिकरण का उदाहरण और क्या हो सकता है कि ब्रह्माकुमारीज़ के मुख्यालय में भाई भोजन बनाते हैं। यह सब संभव हुआ है राजयोग ध्यान से।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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