जीवन जीने की कला सिखाता है योग

लेख: ब्रह्माकुमार सूरज भाई, वरिष्ठ राजयोग प्रशिक्षक, माउंट आबू, राजस्थान

निरहंकारी भाव, साक्षी दृष्टा और श्रेष्ठ स्वमान के अभ्यास से सहज बनेगा परमात्म स्मृति का मार्ग

योग केवल कुछ समय आंखें बंद करके बैठने का अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन जीने की ऐसी कला है, जिसमें मन और बुद्धि परमात्म स्मृति से जुड़े रहें। सच्चा योगी बनने के लिए सबसे पहले अपने भीतर छिपे ‘मैं-पन’ को पहचानकर उसका त्याग करना आवश्यक है। जब मन में यह भाव आता है कि मैंने किया, मेरी जिम्मेदारी है, मुझे ही सब करना है, तभी मन पर बोझ बढ़ने लगता है। इसके विपरीत, हर कार्य में करनकरावनहार परमात्मा की स्मृति रहे तो कर्म करते हुए भी मन हल्का और योगयुक्त रह सकता है।

निरहंकारी बनें, मन को हल्का रखें

योगयुक्त रहने के लिए यह देखना जरूरी है कि हमारे भीतर अहंकार किस रूप में प्रवेश कर रहा है। कभी अपने काम का अभिमान, कभी अपनी उपलब्धियों का गर्व तो कभी दूसरों से अपेक्षाएं—ये सभी मन को भारी बनाते हैं। यदि हर कार्य में यह स्मृति रहे कि परमात्मा की शक्ति और प्रेरणा से सब हो रहा है, तो कर्तापन का भाव कम होने लगता है। यही निरहंकारी बनने का सहज अभ्यास है।

दूसरों को नहीं, स्वयं को देखने का अभ्यास करें

सफल योगी की पहचान है कि वह हर परिस्थिति में साक्षी दृष्टा रहता है। दूसरों के व्यवहार, कमियों और गतिविधियों पर ध्यान देने के बजाय वह अपने विचारों और संस्कारों को देखता है। दूसरों को बदलने की चिंता में हम अक्सर स्वयं को सुधारना भूल जाते हैं। इसलिए हर परिस्थिति को एक साक्षी की तरह देखते हुए अपने मन की स्थिति को श्रेष्ठ बनाए रखना चाहिए। संसार के घटनाक्रम को एक खेल समझकर अपनी जिम्मेदारियां सहजता से निभाना ही ज्ञानयुक्त जीवन की पहचान है।

परमात्मा को अपना संबंधी बनाएं

योग का एक सरल मार्ग भावनात्मक संबंध है। जब मन से यह स्वीकार कर लेते हैं कि परमात्मा मेरे पिता, मेरे साथी और मेरे अपने हैं, तब उनकी याद सहज होने लगती है। दूसरा मार्ग बुद्धियोग का है, जिसमें मन और बुद्धि को परमात्मा की स्मृति में स्थिर किया जाता है। दोनों ही विधियां एक-दूसरे की पूरक हैं। सच्चे दिल से यह अनुभव करना कि ‘बाबा मेरा है और मैं बाबा का हूं’, योग की मजबूत नींव बन सकता है।

पांच दिनों में पांच प्रकार से करें योग का अभ्यास

योग को रुचिकर और अनुभवपूर्ण बनाने के लिए अलग-अलग विधियों से अभ्यास किया जा सकता है।

  • पहले दिन अनुभव करें कि परमात्मा ने अपना वरदानी हाथ मेरे सिर पर रखा है।

  • दूसरे दिन परमात्मा की हजारों भुजाओं की छत्रछाया स्वयं पर अनुभव करें।

  • तीसरे दिन कल्पना करें कि बाबा मेरे साथ हैं और मैं उनके साथ घर में घूम रहा हूं।

  • चौथे दिन परमात्मा के साथ आनंदमय मिलन और रास का अनुभव करें।

  • पांचवें दिन उन्हें अपना सच्चा साथी बनाकर दिनभर के कार्यों में उनकी मदद और साथ का अनुभव करें।

भोजन बनाते समय, यात्रा करते हुए या किसी कठिन परिस्थिति में परमात्मा को याद करना भी योग का सुंदर अभ्यास है। इसके लिए किसी विशेष बाहरी व्यवस्था की आवश्यकता नहीं, बल्कि सच्चे दिल से स्मृति और आह्वान जरूरी है।

द्वेष और नफरत छोड़ें, तभी बनेगा मन पवित्र

मन में किसी के प्रति नफरत, द्वेष या बदले की भावना हो तो योग की गहराई का अनुभव कठिन हो जाता है। किसी ने मुझे दुख दिया, मेरे साथ अन्याय किया या मेरा जीवन कठिन बनाया—ऐसे विचारों में उलझे रहने से मन अशांत रहता है। इसके बजाय परिस्थितियों से सीख लेकर स्वयं को परमात्मा के निकट लाने का अवसर समझें। दूसरों के व्यवहार के कारण अपनी आंतरिक शांति को नष्ट न होने दें। क्षमा, प्रेम और शुभभावना को जीवन में स्थान देना योगी जीवन की महत्वपूर्ण पहचान है।

पांच प्रकार की तपस्या से बनाएं श्रेष्ठ जीवन

आत्म-अभिमानी स्थिति, आत्मिक दृष्टि, संपूर्ण पवित्रता, बुद्धि की स्थिरता और स्वमान का अभ्यास—ये पांच ऐसे आधार हैं, जिनसे योग की स्थिति मजबूत होती है। प्रतिदिन कुछ समय इनका अभ्यास करने से आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति बढ़ती है। मन और बुद्धि को जब चाहें, जहां चाहें और जितनी देर चाहें परमात्म स्मृति में स्थिर कर पाना ही योग की श्रेष्ठ स्थिति है।

रोज दस मिनट करें स्वमान का अभ्यास

दिनचर्या में प्रतिदिन दस मिनट श्रेष्ठ स्वमानों के चिंतन के लिए निकालें। स्वयं को याद दिलाएं—मैं महान आत्मा हूं, मैं शांत स्वरूप हूं, मैं सुख स्वरूप हूं, मैं पवित्र आत्मा हूं और परमात्मा की संतान हूं। इन श्रेष्ठ संकल्पों को केवल दोहराएं नहीं, बल्कि उनका अनुभव करने का प्रयास करें। जब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानती है, तब व्यर्थ विचारों की गति कम होने लगती है और मन में शांति का अनुभव बढ़ता है।

योगयुक्त जीवन का सार यही है कि कर्तापन के अहंकार से मुक्त होकर, दूसरों के प्रति शुभभावना रखते हुए और परमात्मा को अपना साथी बनाकर प्रत्येक कर्म करें। निरहंकारी मन, निर्मल दृष्टि और श्रेष्ठ स्वमान ही सहज योग की सच्ची पहचान हैं।

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